AI और आधुनिक उपकरणों से इलाज होगा ज्यादा सुरक्षित, केंद्र ने जारी की नई गाइडलाइन

नई दिल्लीः केंद्र सरकार ने अस्पतालों में मेडिकल डिवाइस की सुरक्षा की निगरानी के लिए व्यवस्थित और सक्रिय सिस्टम बनाने को कहा है. इसके लिए जारी नए गाइडेंस डॉक्यूमेंट में हेल्थकेयर सेंटर्स से कहा गया है कि वे जरूरी डिवाइस की नियमित रूप से निगरानी करें. हर विभाग में नोडल अधिकारी नियुक्त करें और किसी भी घटना, खराबी, बाल-बाल बचे हादसों या बुरे असर की तुरंत रिपोर्ट करें.

सोमवार को नई दिल्ली में “भारत में अस्पतालों के लिए मेडिकल डिवाइस से जुड़ी घटनाओं/बुरे असर की सुरक्षा निगरानी और रिपोर्टिंग के लिए गाइडेंस डॉक्यूमेंट- मैटेरियोविजिलेंस प्रोग्राम ऑफ़ इंडिया (MvPI), 2026” जारी किया गया. इसका मकसद मेडिकल टेक्नोलॉजी (जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सॉफ्टवेयर से चलने वाले डिवाइस भी शामिल हैं) के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के बीच मेडिकल डिवाइस की पोस्ट-मार्केट निगरानी को मजबूत करना है.

इंडियन फार्माकोपिया कमीशन (IPC) ने वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन (WHO) इंडिया और दूसरे सहयोगी संगठनों के साथ मिलकर यह डॉक्यूमेंट तैयार किया है. यह डॉक्यूमेंट अस्पतालों और हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स को मेडिकल डिवाइस से जुड़ी सुरक्षा संबंधी संभावित चिंताओं की पहचान करने, उनका रिकॉर्ड रखने, उनका आकलन करने और उनकी रिपोर्ट करने के लिए एक रूपरेखा देता है.

आईपीसी के सचिव एवं वैज्ञानिक निदेशक डॉ. वी. कलैसेल्वन ने कहा- “मेडिकल उपकरणों से जुड़ी संदिग्ध घटनाओं और उनके दुष्प्रभावों की लगातार निगरानी और समय पर रिपोर्टिंग करने की बहुत जरूरत है, विशेष रूप से ऐसे समय में जब भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से लैस और सॉफ्टवेयर से चलने वाली मेडिकल तकनीकों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है.”

हाई-रिस्क उपकरणों की सक्रिय निगरानी

  • यह दिशा-निर्देश उन क्रिटिकल और जीवन रक्षक मेडिकल उपकरणों की सक्रिय निगरानी पर विशेष जोर देता है, जिनका उपयोग गहन देखभाल (ICU), कार्डियोलॉजी, न्यूरोसर्जरी, ऑन्कोलॉजी (कैंसर) और आपातकालीन देखभाल जैसे हाई-रिस्क वाले क्लीनिकल क्षेत्रों में किया जाता है.
  • अस्पतालों को एक व्यवस्थित निगरानी तंत्र स्थापित करने की सलाह दी गई है, जिसमें उपकरणों के प्रदर्शन, उनके दुष्प्रभावों, खराबी, शिकायतों और बाल-बाल बची दुर्घटनाओं को शामिल किया जाए.
  • दस्तावेज के अनुसार, इस तरह की निगरानी से किसी गड़बड़ी के शुरुआती संकेतों का पता लगाने, उसके मूल कारण का विश्लेषण करने और सुधारात्मक व निवारक कार्रवाई करने में आसानी हो सकती है.
  • इस प्रस्तावित प्रणाली के तहत, अस्पताल उपकरणों के उपयोग और उनके जोखिम के स्तर के आधार पर, चिन्हित किए गए महत्वपूर्ण मेडिकल उपकरणों की सूची की साप्ताहिक या मासिक आधार पर नियमित निगरानी करेंगे.
  • इस श्रेणी में आमतौर पर वे उपकरण शामिल होते हैं जो शरीर के भीतर प्रत्यारोपित (इम्प्लांटेबल) किए जाते हैं, जीवन रक्षक होते हैं, या फिर ऐसे उपकरण होते हैं जिनमें खराबी आने से गंभीर परिणाम हो सकते हैं.
  • दिशानिर्देशों के अनुसार, सक्रिय निगरानी के तहत आने वाले इन उपकरणों की सूची को संबंधित क्लीनिकल विभागों में प्रमुखता से प्रदर्शित भी किया जाना है, जिनमें गहन देखभाल इकाइयां (ICU), ऑपरेशन थिएटर (OT), कैथीटेराइजेशन लेबोरेट्रीज (कैथ लैब) और स्पेशलिटी वार्ड शामिल हैं.

निगरानी की देखरेख के लिए नोडल अधिकारी

यह दिशा-निर्देश सक्रिय निगरानी करने वाले प्रत्येक विभाग में एक नामित नोडल व्यक्ति नियुक्त करने का आह्वान करता है. इसमें कहा गया है, “नोडल अधिकारी उपकरणों के प्रदर्शन की नियमित निगरानी करने, स्वास्थ्य कर्मियों को संभावित जोखिमों के प्रति संवेदनशील बनाने और किसी भी घटना या दुष्प्रभाव की समय पर रिपोर्टिंग सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार होगा.”

दस्तावेज में विशेष रूप से यह आवश्यक किया गया है कि निगरानी में शामिल उपकरणों से जुड़ी किसी भी प्रतिकूल घटना, दुर्घटना, बाल-बाल बची गड़बड़ी या खराबी की रिपोर्ट निर्धारित समय सीमा के भीतर आईपीसी के ‘नेशनल कोऑर्डिनेटिंग सेंटर-MvPI’ को तुरंत दी जाए. अस्पतालों से उन उपकरणों पर भी अधिक ध्यान देने को कहा गया है जिनके लिए आईपीसी ने एमवीपीआई के तहत सुरक्षा अलर्ट या एडवाइजरी जारी की है.

पहचान से लेकर नियामक कार्रवाई तक

आईपीसी (IPC) स्थित नेशनल कोऑर्डिनेटिंग सेंटर-MvPI (NCC-MvPI) संभावित सुरक्षा संकेतों और उपकरणों से जुड़े नए जोखिमों की पहचान करने के लिए रिपोर्ट की गई ‘मेडिकल डिवाइस एडवर्स इवेंट्स’ का विश्लेषण करना जारी रखेगा.

दिशानिर्देश में कहा गया है कि संदिग्ध संकेतों का एक व्यवस्थित वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाएगा, जो उपलब्ध क्लीनिकल और उपकरण-संबंधी जानकारी, रिपोर्ट की गई घटनाओं की निरंतरता, आवृत्ति, गंभीरता और किसी उपकरण व प्रतिकूल घटना के बीच संभावित संबंध पर आधारित होगा.

इसमें कहा गया है, कि संभावित संकेतों की बाद में आईपीसी में आंतरिक वैज्ञानिक समीक्षा बैठकों और विषय विशेषज्ञों, मेडिकल डिवाइस एक्सपर्ट्स, डॉक्टरों, जांचकर्ताओं व नियामक प्रतिनिधियों के साथ परामर्श के माध्यम से जांच की जा सकती है.

इस बहुविषयक मूल्यांकन का उद्देश्य संकेतों के मूल्यांकन को मजबूत करना और जहां भी आवश्यक हो, गड़बड़ी के मूल कारण का विश्लेषण करने की सुविधा प्रदान करना है.

दिशानिर्देशों में सुझाव दिया गया है, “जहां उपलब्ध क्लीनिकल, तकनीकी और वैज्ञानिक साक्ष्य किसी उपकरण और उसके दुष्प्रभाव के बीच एक संभावित संबंध स्थापित करते हैं या ऐसा होने का पुख्ता संकेत देते हैं, वहां एनसीसी-एमवीपीआई उचित नियामक कार्रवाई पर विचार करने के लिए अपना मूल्यांकन और सिफारिशें केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) को भेज सकता है.”

इस तरह की कार्रवाई में आगे की जांच करना, निर्माताओं या अन्य हितधारकों से तकनीकी जानकारी मांगना, सुरक्षा निर्देश या अलर्ट जारी करना, सुधारात्मक या निवारक उपाय करना, बाजार में आने के बाद की निगरानी को बढ़ाना, या उत्पाद को बाजार से वापस लेना शामिल हो सकता है.

कारण पूरी तरह स्पष्ट होने से पहले ही सुरक्षा अलर्ट

  • यह दिशा-निर्देश उन मामलों में भी जोखिम की जानकारी देने का प्रावधान करता है जहां किसी उपकरण और उसके दुष्प्रभाव के बीच संबंध होने का संदेह तो है, लेकिन अभी तक उसकी पुख्ता तौर पर पुष्टि नहीं हो पाई है.
  • ऐसी स्थितियों में, एनसीसी-एमवीपीआई (NCC-MvPI) ‘मेडिकल डिवाइस मॉनिटरिंग सेंटर्स’ (MDMCs) और ‘एडवर्स ड्रग रिएक्शन मॉनिटरिंग सेंटर्स’ को सुरक्षा अलर्ट जारी कर सकता है, ताकि स्वास्थ्य पेशेवरों के बीच सतर्कता बढ़ाई जा सके और इसी तरह की या बार-बार होने वाली घटनाओं की पहचान करने में आसानी हो.
  • इस तरह के अलर्ट प्राप्त करने वाले अस्पतालों से यह उम्मीद की जाती है कि वे संबंधित क्लीनिकल और तकनीकी कर्मचारियों के बीच इस जानकारी को प्रसारित (शेयर) करें, विशेष रूप से उन लोगों के साथ जो संबंधित उपकरणों की खरीद, उपयोग, रखरखाव और निगरानी में शामिल हैं.
  • स्वास्थ्य सुविधाओं को मरीजों की निगरानी मजबूत करने, क्लीनिकल रिकॉर्ड की जांच करने और नए या इसी तरह के दुष्प्रभावों की रिपोर्ट करने की भी आवश्यकता हो सकती है.
  • इस तरह की बढ़ी हुई निगरानी के माध्यम से मिलने वाली अतिरिक्त जानकारी से आईपीसी (IPC) को यह तय करने में मदद मिल सकती है कि क्या कोई संदिग्ध संबंध एक सुसंगत और क्लीनिकल रूप से महत्वपूर्ण सुरक्षा संकेत है या नहीं.

विदेशों में वापस लिए गए उपकरणों की ट्रैकिंग

इस फ्रेमवर्क का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उन मेडिकल उपकरणों की भारत में उपलब्धता, उपयोग और सुरक्षा स्थिति निर्धारित करने के लिए ‘बेसलाइन अध्ययन’ करने का प्रस्ताव है, जिन्हें भारत या विदेशों में वापस लिया गया है, फील्ड सेफ्टी करेक्टिव एक्शंस (FSCAs), फील्ड सेफ्टी नोटिसेज (FSNs) या अन्य बड़ी सुरक्षा-संबंधी नियामक कार्रवाई के दायरे में लाया गया है.

इस दस्तावेज में उन उपकरणों को ट्रैक करने की परिकल्पना की गई है जिन्हें अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (US FDA), यूरोपीय नियामक प्राधिकरणों, स्विसमेडिक (Swissmedic) और ऑस्ट्रेलिया के चिकित्सीय सामान प्रशासन (TGA) जैसे वैश्विक नियामक अधिकारियों द्वारा चिन्हित किया गया है.

दिशानिर्देशों में कहा गया है, “अस्पतालों से उपकरण और उसके मॉडल, निर्माता व आयातक, वर्गीकरण, बैच या लॉट का विवरण, उपयोग में आने वाले उपकरणों की संख्या, मरीजों पर इसका प्रभाव, रिपोर्ट किए गए दुष्प्रभावों और संबंधित रिकॉल या सुरक्षा नोटिसों के बारे में जागरूकता या उनके कार्यान्वयन सहित अन्य जानकारी प्रदान करने के लिए कहा जा सकता है.”

रिपोर्टों की गुणवत्ता को मापा जाएगा

यह दस्तावेज अस्पतालों और निगरानी केंद्रों द्वारा भेजी जाने वाली दुष्प्रभावों की रिपोर्टों की केवल संख्या गिनने से आगे बढ़ने की कोशिश करता है. इसमें पूरी निगरानी प्रणाली के असर का आकलन करने के लिए मेडिकल डिवाइस एडवर्स इवेंट्स (MDAE) रिपोर्टों की गुणवत्ता, उनकी पूर्णता, क्लीनिकल प्रासंगिकता और निरंतरता के मूल्यांकन का प्रस्ताव दिया गया है.

प्रत्येक रिपोर्ट का मूल्यांकन पहले से तय मापदंडों के आधार पर किया जा सकता है और एक मानक 100-अंकों के पैमाने पर स्कोर दिया जा सकता है. दिशानिर्देशों में सुझाव दिया गया है, “प्रस्तावित मूल्यांकन में यह जांचा जाएगा कि क्या रिपोर्ट निर्धारित प्रारूप में जमा की गई थी और क्या इसमें रिपोर्ट करने वाले, उपकरण, मरीज या उपयोगकर्ता और प्रतिकूल घटना के बारे में पर्याप्त जानकारी मौजूद है.”

अन्य मापदंडों में घटना के विवरण की स्पष्टता और पूर्णता, गंभीरता का उचित वर्गीकरण और विवरण, इसके परिणाम का दस्तावेजीकरण और खराबी के मूल कारण के आकलन की उपयुक्तता शामिल है.

एआई और सॉफ्टवेयर-आधारित उपकरणों से नए जोखिम

यह दिशा-निर्देश भारत के चिकित्सा प्रौद्योगिकी क्षेत्र में तेजी से हो रहे बदलावों की पृष्ठभूमि में आया है.

साल 2015 में एमवीपीआई की शुरुआत के बाद से, मेडिकल उपकरणों का इकोसिस्टम काफी बड़ा हो चुका है. अब प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं में शरीर के अंदर प्रत्यारोपित होने वाले उपकरणों, इन-विट्रो डायग्नोस्टिक्स, कनेक्टेड टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से चलने वाले सिस्टम और ‘सॉफ्टवेयर एज अ मेडिकल डिवाइस’ (SaMD) का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है.

हालांकि ये तकनीकें बीमारी की पहचान, इलाज, निगरानी और पुनर्वास में सुधार कर सकती हैं. लेकिन यह दस्तावेज इस बात की ओर इशारा करता है कि ये तकनीकें सुरक्षा, गुणवत्ता, प्रदर्शन, उपयोगिता और विश्वसनीयता से जुड़ी नई चुनौतियां भी पैदा करती हैं.

दिशानिर्देशों में सुझाव दिया गया है, “दवाइयों के विपरीत, मेडिकल उपकरणों में कई अलग-अलग कारणों से जोखिम हो सकते हैं. इनमें उपकरण की बनावट और सामग्री की विशेषताएं, मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट, सॉफ्टवेयर से जुड़ी समस्याएं, अपर्याप्त रखरखाव, यूजर की गलती, नाकाफी ट्रेनिंग, गलत इस्तेमाल और दो उपकरणों के बीच आपस में होने वाले टकराव शामिल हैं.”