उत्तर प्रदेश में पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) और राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस) का मुद्दा पिछले कई वर्षों से सरकारी कर्मचारियों के बीच चर्चा का विषय रहा है। 25 सितंबर 2026 को लखनऊ के ईको गार्डन में अटेवा की महारैली में भी शिक्षक-कर्मचारियों ने पुरानी पेंशन बहाली की मांग उठाई। प्रदर्शनकारियों ने एनपीएस के साथ निजीकरण और अन्य कर्मचारी संबंधी मुद्दे भी उठाए। इससे एक बार फिर यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो गया कि उत्तर प्रदेश में पुरानी पेंशन से नई पेंशन व्यवस्था तक का सफर कैसे हुआ और इस दौरान राज्य सरकार ने क्या-क्या बदलाव किए।

2005 में बदली पेंशन व्यवस्था
देश में सरकारी कर्मचारियों के लिए लंबे समय तक पुरानी पेंशन व्यवस्था लागू रही। इस व्यवस्था में सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन निर्धारित नियमों के आधार पर मिलती थी। इसके बाद केंद्र सरकार ने 1 जनवरी 2004 से नए केंद्रीय कर्मचारियों के लिए नई अंशदायी पेंशन व्यवस्था लागू की। धीरे-धीरे विभिन्न राज्यों ने भी इसे अपनाना शुरू किया।
उत्तर प्रदेश में 28 मार्च 2005 को नई परिभाषित अंशदायी पेंशन योजना लागू करने की अधिसूचना जारी हुई। इसके अनुसार 1 अप्रैल 2005 या उसके बाद राज्य सरकार की नई भर्तियों पर नई पेंशन व्यवस्था लागू की गई। उत्तर प्रदेश विधान परिषद की आधिकारिक जानकारी भी 1 अप्रैल 2005 से प्रदेश में एनपीएस लागू होने की पुष्टि करती है।
पुरानी और नई व्यवस्था में मूल अंतर पेंशन की प्रकृति का है। पुरानी व्यवस्था में सरकार की जिम्मेदारी अधिक प्रत्यक्ष थी और पेंशन निर्धारित नियमों के आधार पर मिलती थी। एनपीएस में कर्मचारी और सरकार दोनों पेंशन खाते में योगदान करते हैं। शुरुआती व्यवस्था में कर्मचारी का योगदान मूल वेतन और महंगाई भत्ते के योग का 10 प्रतिशत तथा सरकार का योगदान भी 10 प्रतिशत था।
1 अप्रैल 2005 से एनपीएस लागू करने का निर्णय हो गया था, लेकिन इसके प्रशासनिक क्रियान्वयन में समय लगा। स्थायी सेवानिवृत्ति खाता संख्या (पीआरएएन) तथा योगदान के हस्तांतरण जैसी व्यवस्थाएं बाद के वर्षों में विकसित हुईं। अभिलेखों में 2011-12 में एनपीएस क्रियान्वयन की व्यवस्थाओं में तेजी आने और विभिन्न विभागों में पीआरएएन आवंटन से संबंधित आदेशों का उल्लेख है। उसके अनुसार 1 अप्रैल 2012 से 31 मार्च 2020 के बीच लगभग 4.53 लाख कर्मचारियों का पीआरएएन पंजीकरण हुआ और कर्मचारी तथा सरकारी अंशदान मिलाकर बड़ी राशि ट्रस्टी बैंक को हस्तांतरित की गई। साथ ही, आडिट के दौरान कुछ व्यावहारिक कमियां भी सामने आईं, जैसे पीआरएएन आवंटन के बाद अंशदान की कटौती में देरी या पीआरएएन आवंटन लंबित रहना।
एनपीएस को लेकर कर्मचारी संगठनों की प्रमुख आपत्ति यह रही है कि इसमें सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली राशि पहले से निश्चित नहीं होती। कर्मचारी और सरकार द्वारा जमा राशि का निवेश पेंशन फंड मैनेजरों के माध्यम से किया जाता है और अंतिम सेवानिवृत्ति आय जमा कार्पस तथा निवेश से जुड़े परिणामों पर निर्भर करती है। दूसरी ओर, सरकार की ओर से एनपीएस को अंशदायी व्यवस्था बताया गया है, जिसमें कर्मचारी और सरकार दोनों योगदान करते हैं। सरकारी पक्ष में इसे दीर्घकालिक राजकोषीय दायित्व को व्यवस्थित करने और वृद्धावस्था सुरक्षा की व्यवस्था के संदर्भ में देखा गया है। इसलिए ओपीएस और एनपीएस की बहस केवल पेंशन की राशि की नहीं, बल्कि सरकार की दीर्घकालिक वित्तीय जिम्मेदारी और कर्मचारी की सेवानिवृत्ति आय की प्रकृति से भी जुड़ी है।
योगी सरकार के दौरान प्रमुख बदलाव
योगी सरकार के कार्यकाल में एनपीएस को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय इसमें कई कर्मचारी हित केंद्रित बदलाव किए गए। सबसे प्रमुख बदलाव सरकार के अंशदान से जुड़ा था। फरवरी 2019 में राज्य सरकार का योगदान 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 14 प्रतिशत किया गया। कर्मचारी का योगदान 10 प्रतिशत ही रहा। इसका अर्थ है कि कर्मचारी के पेंशन खाते में सरकार की ओर से पहले की तुलना में अधिक राशि जाने लगी। इसके अलावा पीआरएएन खाता देर से खुलने या अंशदान में देरी होने की स्थिति में ब्याज सहित राशि जमा करने की व्यवस्था की गई। इसका उद्देश्य प्रशासनिक देरी के कारण कर्मचारी के पेंशन खाते को होने वाले संभावित नुकसान से बचाना था।
एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव 2022 में सेवाकाल के दौरान कर्मचारी की मृत्यु से संबंधित था। यदि परिवार ने पारिवारिक पेंशन का विकल्प चुना है, तो निर्धारित प्रावधानों के अनुसार कर्मचारी के एनपीएस खाते में जमा कर्मचारी अंश का भुगतान परिवार को किए जाने की व्यवस्था की गई।
उत्तर प्रदेश में एक बड़ी समस्या उन कर्मचारियों की थी, जिनकी भर्ती का विज्ञापन 28 मार्च 2005 से पहले जारी हो चुका था, लेकिन भर्ती प्रक्रिया लंबी होने के कारण उन्होंने 1 अप्रैल 2005 के बाद नौकरी शुरू की। ऐसे कर्मचारी तकनीकी रूप से एनपीएस के दायरे में आ गए, जबकि उनकी भर्ती प्रक्रिया एनपीएस लागू होने से पहले शुरू हो चुकी थी।
28 जून 2024 के शासनादेश के माध्यम से ऐसे पात्र कर्मचारियों को पुरानी पेंशन योजना का विकल्प देने की व्यवस्था की गई। इसके बाद 11 जुलाई 2024 और 22 अगस्त 2024 के स्पष्टीकरण और कार्यालय आदेश तथा 2025 में आगे के निर्णयों के माध्यम से प्रक्रिया और समय सीमा में भी बदलाव हुए। उत्तर प्रदेश सरकार के अभिलेखों के अनुसार जुलाई 2025 में संबंधित कट आफ तिथियों को भी बढ़ाया गया। यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे मामला केवल भविष्य की भर्तियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन पुराने भर्ती मामलों को भी संरक्षित किया गया, जिनमें विज्ञापन पहले हो चुका था, लेकिन नियुक्ति बाद में हुई।
ओपीएस और एनपीएस दोनों व्यवस्थाओं की मूल संरचना अलग है। ओपीएस में पेंशन निर्धारित लाभ वाली व्यवस्था से जुड़ी है, जबकि एनपीएस योगदान और कार्पस आधारित व्यवस्था है। एनपीएस में कर्मचारी के 10 प्रतिशत योगदान के साथ सरकार का 14 प्रतिशत योगदान होता है। जमा धन का निवेश किया जाता है, जिससे लंबी अवधि में कार्पस बढ़ने की संभावना रहती है।
एनपीएस में सेवानिवृत्ति के समय सामान्य नियमों के तहत कार्पस का एक हिस्सा एकमुश्त लिया जा सकता है और शेष राशि सालाना माध्यम से नियमित आय प्राप्त करने की व्यवस्था होती है। इस प्रकार एनपीएस केवल मासिक पेंशन की ही व्यवस्था नहीं है, बल्कि कर्मचारी के लिए दीर्घकालिक सेवानिवृत्ति कार्पस बनाने की प्रणाली भी है।
उत्तर प्रदेश में पुरानी पेंशन से नई पेंशन तक का सफर केवल एक योजना के बदलने की कहानी नहीं है। यह सरकारी कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा, सेवानिवृत्ति आय, सरकारी वित्त और कर्मचारी योगदान इन सभी पहलुओं से जुड़ा विषय है। 2005 में एनपीएस लागू होने के बाद इसके क्रियान्वयन में कई चरण आए और समय के साथ इसमें बदलाव भी हुए। सरकार के अंशदान को 10 से 14 प्रतिशत करना, देरी से हुए योगदान पर ब्याज की व्यवस्था और 2005 से पहले विज्ञापित भर्तियों के पात्र कर्मचारियों को ओपीएस का विकल्प देना इसी क्रम का हिस्सा हैं।
वर्तमान बहस में ओपीएस समर्थक कर्मचारी निश्चित पेंशन और भविष्य की आय की स्पष्टता पर जोर देते हैं, जबकि एनपीएस की संरचना कर्मचारी और सरकार के संयुक्त योगदान तथा निवेश आधारित सेवानिवृत्ति कार्पस पर आधारित है। इसलिए इस पूरे विषय को समझने के लिए केवल पुरानी बनाम नई पेंशन के रूप में देखने के बजाय दोनों व्यवस्थाओं की वित्तीय संरचना, कर्मचारी योगदान, सरकारी दायित्व और सेवानिवृत्ति के बाद आय के तरीके को साथ-साथ समझना आवश्यक है।
