पुलिसकर्मियों का मोटरसाइकिल भत्ता ₹700 से बढ़कर ₹1,000, वर्दी भत्ता ₹15 हजार और सिम भत्ता ₹2,500 होगा: सीएम योगी

लखनऊ: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुधवार को पुलिस स्मृति दिवस-2026 के अवसर पर लखनऊ में आयोजित स्मृति परेड में पुलिसकर्मियों के भत्तों में बढ़ोतरी की तीन महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं। उन्होंने कहा कि फील्ड ड्यूटी में तैनात उपनिरीक्षकों और निरीक्षकों का मोटरसाइकिल भत्ता 700 रुपये से बढ़ाकर 1,000 रुपये प्रतिमाह किया जा रहा है। पीपीएस संवर्ग के अधिकारियों का वर्दी भत्ता 6,400 रुपये से बढ़ाकर 15,000 रुपये किया जाएगा। इसके साथ ही फील्ड ड्यूटी में तैनात आरक्षियों और मुख्य आरक्षियों का सिम भत्ता 2,000 रुपये से बढ़ाकर 2,500 रुपये किया जा रहा है।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने पुलिस शहीद स्मारक स्थल पर पुष्पचक्र अर्पित कर अमर शहीदों को श्रद्धांजलि दी। इसके पश्चात वरिष्ठ प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों व कर्मचारियों ने भी पुष्पांजलि अर्पित कर वीर शहीदों को नमन किया। मुख्यमंत्री ने कर्तव्यपालन के दौरान अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान देने वाले पुलिसकर्मियों को नमन करते हुए कहा कि शहीदों के प्रति राष्ट्र का ऋण कभी चुकाया नहीं जा सकता। पुलिसकर्मियों की मुस्तैदी और कर्तव्यनिष्ठा ही प्रदेश में कानून का राज स्थापित करने की आधारशिला है।

पूरा देश विजयादशमी मना रहा था, पुलिसकर्मी मुस्तैदी से ड्यूटी निभा रहे थे

मुख्यमंत्री ने कहा कि किसी बच्चे का सुरक्षित विद्यालय पहुंचना, किसी बेटी का निर्भय होकर घर से बाहर निकलना, किसी व्यापारी का बिना भय अपना कारोबार करना और किसी नागरिक को संकट के समय सहायता मिलना सामान्य घटनाएं दिखाई देती हैं, लेकिन इनके पीछे पुलिसकर्मियों का निरंतर परिश्रम, सतर्कता और असाधारण दायित्वबोध होता है। जब पूरा देश विजयादशमी का उत्सव मना रहा था, परिवार खुशियां बांट रहे थे और जगह-जगह रावण के पुतले जलाए जा रहे थे, तब पुलिसकर्मी मुस्तैदी से ड्यूटी निभा रहे थे, ताकि प्रत्येक नागरिक निर्भय होकर त्योहार का आनंद ले सके। शहीदों के नाम केवल स्मारकों पर अंकित नहीं होते, वे राष्ट्र की नैतिक चेतना में अंकित रहते हैं। हम उनके जीवन की सभी परिस्थितियों को भले न जानते हों, लेकिन उनके अंतिम निर्णय का महत्व अवश्य समझ सकते हैं। जब कर्तव्य और व्यक्तिगत आकांक्षाओं के बीच कठिन चुनाव की घड़ी आई, तब उन्होंने कर्तव्य को प्राथमिकता दी। उनके साहस पर हमारा मस्तक गर्व से ऊंचा होता है और उनके प्रति कृतज्ञता हमें अपने दायित्वों का बोध कराती है।

हॉट स्प्रिंग की घटना से जुड़ा है पुलिस स्मृति दिवस

मुख्यमंत्री ने पुलिस स्मृति दिवस के ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख करते हुए कहा कि 21 अक्टूबर, 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद सरकार की स्थापना कर भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष को ऐतिहासिक स्वरूप दिया था। इसी तारीख को वर्ष 1959 में लद्दाख के हॉट स्प्रिंग क्षेत्र में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 10 वीर जवानों ने चीनी सैनिकों के घात लगाकर किए गए हमले का बहादुरी से सामना करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। एक ओर स्वतंत्रता के संकल्प का इतिहास है, तो दूसरी ओर राष्ट्र की रक्षा में सर्वोच्च बलिदान की गाथा। दोनों घटनाएं त्याग, साहस और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा देती हैं। विजयादशमी के अगले दिन पुलिस स्मृति दिवस का आयोजन बुराई पर अच्छाई की विजय के संदेश को और भी गहरा करता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने वर्ष 2018 में राष्ट्रीय पुलिस स्मारक राष्ट्र को समर्पित करते हुए पुलिस बलों के गौरवशाली इतिहास, साहस और बलिदान की स्मृति को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने पर बल दिया था। स्मारक पर अंकित प्रत्येक नाम अपने भीतर एक कहानी समेटे हुए है। किसी जवान ने परिवार के साथ भविष्य की योजनाएं बनाई होंगी, किसी ने अपने बच्चे को आगे बढ़ते देखने का सपना संजोया होगा और किसी ने माता-पिता की सेवा का संकल्प लिया होगा। लेकिन कर्तव्य की पुकार आने पर उन्होंने व्यक्तिगत आकांक्षाओं से ऊपर राष्ट्र और समाज की सुरक्षा को रखा। अटल जी की सरकार ने राष्ट्रीय पुलिस स्मारक बनाने की पहल की थी, लेकिन राजनीतिक स्वार्थ के कारण इस काम को लटकाया गया। पुलिस के अमर शहीदों का सम्मान किसी राजनीतिक विचार तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति कृतज्ञता का विषय है।

पहले अपराधी को हाथ लगाते ही सत्ता के गलियारों से आने लगते थे फोन

मुख्यमंत्री ने पूर्ववर्ती सपा सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि एक दौर ऐसा भी था, जब पुलिस का थानेदार या एसपी किसी अपराधी के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले सोचता था, क्योंकि अपराधी के खिलाफ कदम उठाते ही सत्ता के गलियारों से फोन आने लगते थे। कुछ ही घंटों में अपराधी के बजाय अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई हो जाती थी। पुलिस को अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय सत्ता से जुड़े लोगों के निजी कामों में उलझाया जाता था। थानों में सीलन भरी बैरकें और खपरैल की टपकती छतें थीं। पीएसी की कंपनियों को बंद करने के प्रयास किए जा रहे थे। अपराधी खुलेआम हथियार लहराते थे, जबकि पुलिसकर्मियों के पास पुराने और जंग लगे हथियार थे। अपराधियों का समानांतर राज स्थापित हो गया था और कानून तमाशबीन बना हुआ था। जो लोग पुलिस की कार्रवाई, मुठभेड़ और जीरो टॉलरेंस की नीति पर सवाल उठाते हैं, वही दुर्दांत माफिया और आतंकियों के मारे जाने पर उनके समर्थन में खड़े दिखाई देते हैं। लेकिन जब माफिया की गोलियों से कोई निर्दोष पुलिसकर्मी शहीद होता है, तब उसके अनाथ बच्चों के आंसू पोंछने के लिए संवेदना नहीं दिखाई देती। जब व्यापारी का अपहरण होता था या बहन-बेटियों के सम्मान पर हमला होता था, तब भी ऐसे लोगों की संवेदना सामने नहीं आती थी। आज अपराधियों को पता है कि उत्तर प्रदेश में उनका आखिरी ठिकाना कहां है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि पहले पुलिस में हजारों पद खाली पड़े थे। इसकी वजह केवल संसाधनों का अभाव नहीं, बल्कि अपने-पराये की भेदभावपूर्ण नीति थी। थाने की कुर्सी पर भले ही उपनिरीक्षक या निरीक्षक बैठता था, लेकिन फैसले कहीं और से आते थे। वर्ष 2012 से 2017 के बीच उत्तर प्रदेश में 815 दंगे हुए। हर दंगे का असर किसी गरीब की दुकान, मजदूर की दिहाड़ी और बच्चे की पढ़ाई पर पड़ता था। मथुरा के जवाहर बाग की घटना इसका उदाहरण है, जहां कब्जा करने वालों को संरक्षण मिला और पुलिस अधीक्षक मुकुल द्विवेदी तथा थानाध्यक्ष संतोष यादव को अपने प्राण गंवाने पड़े।

2017 के बाद पुलिस के हाथों से राजनीतिक बेड़ियां तोड़ीं

मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्ष 2017 में सरकार बनने के बाद पुलिस के हाथों की राजनीतिक बेड़ियां तोड़ी गईं। पुलिस से स्पष्ट कहा गया कि गरीब, पीड़ित, व्यापारी और बहन-बेटियों के सम्मान की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, लेकिन समाज में आतंक फैलाने वाले अपराधी, माफिया और दंगाइयों के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई जाए। शीत ऋतु की ठिठुरन, जेठ की झुलसाती दोपहरी और भारी बारिश में पुलिसकर्मी सड़कों पर मुस्तैद…