सनातन धर्म में महालया को पितृ पक्ष की समाप्ति और शारदीय नवरात्रि की शुरुआत के बीच का सबसे महत्वपूर्ण बदलाव का समय माना जाता है. महालया अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) पितृ पक्ष का आखिरी दिन होता है, और इसके अगले दिन से देवी पक्ष और शारदीय नवरात्रि या दुर्गा पूजा की शुरुआत होती है. इस तरह, शारदीय दुर्गा पूजा के उत्सव की शुरुआत महालया से ही हो जाती है. शास्त्रों के अनुसार, इसी दिन देवी दुर्गा को महिषासुर का वध करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी और इसी दिन वे धरती पर अवतरित हुई थीं.
महालय का दिन न केवल शारदीय नवरात्र और दूर्गा पूजा की शुरुआत का प्रतीक है, बल्कि यह दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए जल चढ़ाने का दिन भी है. जो लोग अपने पूर्वजों की पुण्यतिथि पर वार्षिक श्राद्ध कर्म नहीं कर पाते, उनके लिए शास्त्रों में इस दिन यह अनुष्ठान करना उचित माना गया है. चूंकि अमावस्या की तिथि दिवंगत आत्माओं के लिए शुभ मानी जाती है, इसलिए पितृ पक्ष का आखिरी दिन (जो अमावस्या को पड़ता है) पूर्वजों को जल अर्पित करने और उनका आशीर्वाद पाने का एक शुभ अवसर होता है.
साल 2026 में महालया शनिवार, 10 अक्टूबर को है. महालया आश्विन अमावस्या को मनाई जाती है, जो पितृ पक्ष का आखिरी दिन होता है. उत्तर भारत में इसी दिन को सर्व पितृ अमावस्या के नाम से जाना जाता है.
महालया क्यों खास है
- सनातन धर्म में ‘महालया’ के शुभ अवसर पर, लोग अपने पूर्वजों या पितरों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए ‘तर्पण’ की रस्म निभाते हैं. महालया की सुबह कोलकाता के बाबूघाट, प्रिंसिप घाट और हुगली नदी के किनारे बने अन्य घाटों पर भक्ति और आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है. नदी में कमर तक पानी में खड़े होकर, पुरुष अपने पिता और दादा के नाम पर जल, तिल और कुशा घास अर्पित करते हैं.
- मान्यता के अनुसार, इसी दिन देवी दुर्गा कैलाश से पृथ्वी (अपने मायके) की ओर अपनी यात्रा शुरू करती हैं.दूसरे शब्दों में, यह दिन बंगाली समुदाय के लिए दुर्गा पूजा की शुरुआत का भी प्रतीक है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दिन देवी दुर्गा पृथ्वी पर आती हैं.
- इस बीच, उत्तरी कोलकाता के कारीगरों के इलाके कुमारतुली में, मूर्ति बनाने वाले पारंपरिक रूप से महालया के दिन दुर्गा प्रतिमाओं की आंखें बनाते हैं. इस रस्म को ‘चक्षुदान’ कहा जाता है. तब तक मूर्तियां अधूरी रहती हैं. आंखें बन जाने के बाद, ऐसा माना जाता है कि देवी ने सचमुच मिट्टी की मूर्ति में प्राण फूंक दिए हैं.
महालय पर क्या करें
अगर आप घर पर ही इसे मना रहे हैं, तो सुबह जल्दी उठें और रेडियो या ऑनलाइन पर महिषासुर मर्दिनी सुनें. अपने पूर्वजों के लिए तर्पण (पानी और तिल चढ़ाना) करें. अगर आपको किसी रिश्तेदार की मृत्यु की सही डेट नहीं पता है, तो महालय के दौरान सभी पूर्वजों के लिए प्रार्थना करें. कौवों और गायों को खाना खिलाएं और जरूरतमंदों को भोजन दान करें. शाम को अपने पूर्वजों के लिए दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके एक दीया जलाएं. फिर, आने वाले दिनों के लिए तैयार हो जाएं. अपने घर में पूजा की जगह को साफ करें और देवी दुर्गा का स्वागत करने के लिए तैयार हो जाएं.
(डिस्क्लेमर: धर्म, ज्योतिष, वास्तु, फेंगशुई आदि पर आधारित यह लेख केवल पाठकों की जानकारी के लिए है. इससे जुड़ी किसी भी प्रक्रिया को आजमाने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है. हमारा मकसद सिर्फ पाठकों को जानकारी देना है, ETV भारत इन तथ्यों की पुष्टि नहीं करता है.)

