रेलवे का बड़ा तोहफा, दक्षिण भारत के 4 राज्यों में ट्रैक का होगा दोहरीकरण

प्रयागराज: दक्षिण भारत में रेल से सफर करने वाले यात्रियों के लिए बड़ी खुशखबरी है. केंद्र सरकार ने तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना के लिए 10,021 करोड़ रुपए की 5 नई मल्टी-ट्रैकिंग (रेलवे लाइन दोहरीकरण और नई पटरियां बिछाने) रेल परियोजनाओं को मंजूरी दे दी है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को हुई कैबिनेट बैठक में यह फैसला लिया गया. इन परियोजनाओं के तहत कुल 540 किलोमीटर नई रेलवे लाइनें बिछाई जाएंगी. इन्हें 2029-30 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है.

आम जनता को सीधा फायदा: इन नई रेल लाइनों के बनने से 17 जिलों के 2,121 गांवों के करीब 52 लाख लोगों को सीधा फायदा पहुंचेगा. ट्रेनों की लेटलतीफी खत्म होगी. पटरियों पर लगने वाला जाम (कंजेशन) घटेगा और नई पैसेंजर ट्रेनें चलाने का रास्ता साफ होगा. साथ ही स्थानीय स्तर पर रोजगार और कारोबार के नए अवसर भी बनेंगे.

इन 5 रेल रूट्स पर बिछेंगी नई पटरियां

  • अरक्कोनम-रेनिगुंटा: 77 किमी लंबी तीसरी और चौथी लाइन बनेगी.
  • व्हाइटफील्ड-बांगरपेट: 47 किमी लंबी तीसरी और चौथी लाइन बिछाई जाएगी.
  • होसुर-ओमालूर: 147 किमी लंबे रूट का दोहरीकरण होगा.
  • सलेम-करूर-डिंडीगुल: 159 किमी लंबे ट्रैक का दोहरीकरण किया जाएगा.
  • सिकंदराबाद (घाटकेसर) से काजीपेट: 110 किमी लंबे रूट पर मल्टी-ट्रैकिंग का काम होगा.

धार्मिक स्थलों तक पहुंचना आसान: सीपीआरओ डॉ. शिवम शर्मा ने बताया कि नई लाइनों के शुरू होने से दक्षिण भारत के कई मशहूर मंदिरों और पर्यटन स्थलों तक पहुंचना बेहद आसान हो जाएगा.

प्रमुख मंदिर जैसे तिरुपति बालाजी, तिरुत्तानी का सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर, तिरूचनूर का पद्मावती मंदिर, कोटिलिंगेश्वर, यादगिरिगुट्टा और स्वर्णगिरि मंदिर तक आसानी से पहुंचा जा सकेगा.

वहीं, पर्यटन स्थल जैसे कोलार गोल्ड फील्ड्स (KGF), होगेनक्कल फॉल्स, मेट्टूर बांध, कोडाइकनाल हिल्स और सत्यमंगलम टाइगर रिजर्व तक रेल नेटवर्क से पहुंच आसान हो जाएगी. इसके अलावा व्यापार को भी रफ्तार मिलेगी. यह पूरा नेटवर्क कोयला, सीमेंट, अनाज, खाद और पेट्रोलियम जैसी जरूरी चीजों की ढुलाई का मुख्य रूट है.

नई पटरियां बनने से रेलवे हर साल 4.7 करोड़ टन अतिरिक्त माल ढो सकेगा. इसके अलावा, सड़कों से लोड कम होने के कारण लगभग 8 करोड़ लीटर तेल की बचत होगी और कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी आएगी, जो कि करीब 2 करोड़ पेड़ लगाने के बराबर है.